अप्सरा भाग-9: तिलोत्तमा के लिए आपस में लड़ मरे सुंद-उपसुंद

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अप्सरा भाग-9: तिलोत्तमा के लिए आपस में लड़ मरे सुंद-उपसुंद


आशुतोष गर्ग

(पिछले हफ्ते आपने पढ़ा कि अलंबुषा नदी में उतरकर दधीचि के सामने स्नान करने लगी। उसे देखकर दधीचि स्वयं को रोक न पाए और उनका वीर्यपात हो गया, जिससे सरस्वती गर्भवती हुई। उनसे ‘सारस्वत’ नामक पुत्र ने जन्म लिया जिसने आगे चलकर ब्राह्मणों में वेदाध्ययन की परंपरा को पुनर्स्थापित किया। अलंबुषा के पुनर्जन्म की कथा से पहले आपने जाना कि ब्रह्मा ने दो असुर भाइयों, सुंद और उपसुंद को अमरता का वरदान नहीं दिया तो असुरों को एक युक्ति सूझी। अब आगे…)

सुंद-उपसुंद ने ब्रह्मा से कहा, ‘आप हमें यह वरदान दीजिए कि हम दोनों, केवल एक-दूसरे के हाथों मारे जाएं। कोई अन्य प्राणी हमारा वध न कर सके!’ ब्रह्मा को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। इसलिए वह असुरों को यह वरदान देकर अंतर्धान हो गए। सुंद और उपसुंद जानते थे कि वे एक-दूसरे से कभी नहीं लड़ेंगे। इसलिए ब्रह्मा के वरदान के चलते उन्हें मार पाना असंभव हो गया। उनका दुस्साहस बढ़ता गया और उन्होंने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

आखिरकार, देवता फिर ब्रह्मा के पास गए और उनसे असुरों का उपाय करने को कहा। ब्रह्मा ने कुछ देर विचार करके देव-शिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया। विश्वकर्मा ने ब्रह्मा को प्रणाम किया और पूछा, ‘प्रभु, मेरे लिए क्या आदेश है?’ ब्रह्मा बोले, ‘तुम्हें एक ऐसी अनुपम कन्या का निर्माण करना है जो तीनों लोकों में सबसे सुंदर और उत्कृष्ट हो। हमारे पास समय कम है!’ ब्रह्मा का आदेश मिलते ही विश्वकर्मा ने तीनों लोकों से सर्वोत्कृष्ट और विस्मयकारी तत्व एकत्रित किए और उन तिल-समान कणों को जोड़कर अप्रतिम सौंदर्य से युक्त एक सुंदरी का निर्माण किया। वह इतनी सुंदर थी कि उसे जो देखता, देखता ही रह जाता था।

विश्वकर्मा ने उसे ब्रह्मा के समक्ष प्रस्तुत किया तो सृष्टि के रचयिता भी उस स्त्री के सौंदर्य पर मुग्ध हो गए। ‘मैं इस अद्भुत अप्सरा का नाम ‘तिलोत्तमा’ रखता हूं क्योंकि इसे तीनों लोकों के सर्वोत्तम तत्वों को तिल-तिल जोड़कर बनाया गया है। यही सुंद और उपसुंद के अंत का कारण बनेगी!’ ब्रह्मा ने भविष्यवाणी कर दी। तिलोत्तमा ने ब्रह्मा से पूछा, ‘प्रभु, मुझे क्या करना है?’ ‘तुम्हें सुंद और उपसुंद को अपने सौंदर्य और आकर्षण से लुभाना है। आगे का कार्य वे दोनों स्वयं कर लेंगे!’ ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए कहा।

तिलोत्तमा तत्काल सुंद और उपसुंद के पास पहुंच गई। उसे देखते ही दोनों असुर भाइयों का रोम-रोम खिल उठा। वे उसके रूप पर मोहित हो गए। तिलोत्तमा के अद्भुत लावण्य ने दोनों के मन में काम-वासना की अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी। ‘कितनी अनुपम स्त्री है! मैंने इतनी सुंदर स्त्री पहले नहीं देखी,’ सुंद खुशी से चिल्लाया। ‘सत्य कहते हो!’ उपसुंद ने भी प्रसन्नता से भरकर कहा। ‘मैं इसे अपनी पत्नी बनाऊंगा!’ ‘नहीं!’ सुंद ने उपसुंद को फटकारा। ‘इसे मैंने पहले देखा है इसलिए यह मेरी पत्नी बनेगी।’ ‘देखने से क्या होता है?’ उपसुंद को भी गुस्सा आ गया। ‘इसे पत्नी बनाने की इच्छा पहले मैंने व्यक्त की थी। मैं इससे विवाह करूंगा।’ तिलोत्तमा के मनमोहक सौंदर्य ने दोनों का विवेक हर लिया था। दोनों भाई उसे पाने के लिए झगड़ने लगे।

सुंद और उपसुंद ने पूरा जीवन साथ रहकर बिताया था। यह पहला अवसर था जब दोनों एक स्त्री को लेकर झगड़ रहे थे। संसार में तिलोत्तमा जैसी दूसरी स्त्री नहीं थी और दोनों ही उसे पाना चाहते थे। उसे प्राप्त करने के लिए लड़ाई होनी स्वाभाविक थी। अचानक सुंद-उपसुंद की बहस ने उग्र रूप ले लिया। अगले ही क्षण, दोनों ने तलवारें निकाल लीं और एक-दूसरे पर टूट पड़े। कुछ ही देर में दोनों ने एक-दूसरे को मार डाला! दोनों असुर धरती पर मृत पड़े थे। देवताओं के लिए यह हर्ष का क्षण था। तिलोत्तमा ने अपना काम पूरा कर दिया था। ब्रह्मा की योजना सफल हो गई। तिलोत्तमा सुंद और उपसुंद की मृत्यु का कारण बनी। इसी तिलोत्तमा के शाप से अलंबुषा को अगले जन्म में अपने पति से अलग होना पड़ा। अब यह कथा बताते हैं।

एक बार देवराज इंद्र विधूम नाम के एक वसु को साथ लेकर ब्रह्मा से मिलने गए थे। इसी बीच अप्सरा अलंबुषा भी ब्रह्मा के पास आई थी। संयोग से हवा का तेज झोंका आया और अलंबुषा के वस्त्र उड़ने लगे। उसका मनमोहक सौंदर्य उजागर हो गया। उसे देखकर विधूम अलंबुषा की ओर आकर्षित हो गया और उसके मन में काम-तरंग उठने लगीं। अलंबुषा ने विधूम की आंखों में काम-जनित प्रेम देखा तो वह भी विधूम के प्रति आसक्त हो गई। अलंबुषा और विधूम के मन में एक-दूसरे को पाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई। देवराज इंद्र ने यह दृश्य देखा तो उन्हें बुरा लगा और उन्होंने दोनों को शाप दे दिया, ‘तुम दोनों मनुष्य के समान दुर्बल हो। मैं शाप देता हूं कि तुम दोनों पृथ्वीलोक पर मनुष्य योनि में जन्म लो और अपनी कामना की पूर्ति करो!’

इंद्र के इस शाप के बाद विधूम ने चंद्रवंश में राजा जनमेजय के पौत्र सहस्रानिक के रूप में जन्म लिया। उधर, अलंबुषा ने राजा कृतवर्मा की पुत्री के रूप में जन्म लिया। उसका नाम मृगावती था। दैवी संयोग से सहस्रानिक और मृगावती की भेंट हुई। दोनों को एक-दूसरे से प्रेम हो गया और उनका विवाह होना भी निश्चित हो गया। परंतु उनके विवाह से पूर्व, देवासुर संग्राम आरंभ हो गया था जिसमें देवताओं की सहायता हेतु इंद्र ने सहस्रानिक को देवलोक बुलाया। युद्ध समाप्त हुआ तो इंद्र ने सहस्रानिक को वापस पृथ्वीलोक भेजने का प्रबंध किया। इंद्र ने रथ में सहस्रानिक के साथ तिलोत्तमा अप्सरा को भी भेज दिया। यह इंद्र की भूल थी लेकिन यही विधि का विधान था।

(जारी……)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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