Home राष्ट्रीय कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर ! Famous Shayari Of Kaifi Azmi

कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर ! Famous Shayari Of Kaifi Azmi

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Kaifi Azmi

कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर:

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कैफ़ी आज़मी के नाम से मशहूर सैय्यद अतहर हुसैन रिज़वी एक भारतीय उर्दू कवि थे। उन्हें भारतीय गति चित्रों में उर्दू साहित्य लाने वाले के रूप में याद किया जाता है। पीरजादा कासिम, जौन एलिया और अन्य लोगों के साथ मिलकर उन्होंने बीसवीं शताब्दी के सबसे यादगार मुशायरों में भाग लिया। आइए पढ़ते हैं कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर:

 

कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर:

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े।

जिस तरह हंस रहा हूं मैं पी-पी के गर्म अश्क,

यूं दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े।

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा,

बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िन्दगी का रहा।

इन्सां की ख़्वाहिशों की कोई इन्तिहा नहीं,

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद।

मेरा बचपन भी साथ ले आया,

गांव से जब भी आ गया कोई।

पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे,

इक मुख़्तसर सी रात में सदियां गुज़र गईं।

जो इक ख़ुदा नहीं मिलत तो इतना मातम क्यों,

मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशां नहीं मिलता।

आज फिर टूटेंगी तेरे घर नाज़ुक खिड़कियां,

आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में।

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले,

मैं अगर थक गया, क़ाफ़िला तो चले।

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं,

याद इतना भी कोई न आए।

तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता,

मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं।

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो,

डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ।

दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार,

कुछ बस्तियां यहां थीं बताओ किधर गईं।

मैं ढूंढ़ता हूं जिसे वो जहां नहीं मिलता,

नई ज़मीन नया आसमां नहीं मिलता।

नई ज़मीन नया आसमां भी मिल जाए

नए बशर का कहीं कुछ निशां नहीं मिलता।

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था,

जिस्म जल जाएंगे जब सर पे न साया होगा,

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना,

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने।

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,

क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो।

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है,

तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो।

दीवाना-वार चांद से आगे निकल गए,

ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बाद।

ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप

क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद।

 

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा

बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िन्दगी का रहा  

इन्साँ की ख़्वाहिशों की कोई इन्तिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद

मेरा बचपन भी साथ ले आया

गाँव से जब भी आ गया कोई

पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे

इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं

जो इक ख़ुदा नहीं मिलत तो इतना मातम क्यों

मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशाँ नहीं मिलता

आज फिर टूटेंगी तेरे घर नाज़ुक खिड़कियाँ

आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले

मैं अगर थक गया, क़ाफ़िला तो चले

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं

याद इतना भी कोई न आए

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता

मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो

डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ

दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार

कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं

मैं ढूँढ़ता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता

नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए

नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था

जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है

तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो

दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए

ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बाद

ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप

क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद

Written By- Kaifi Azmi

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