योगी आदित्यनाथ ह्दय से नमन है तुम्हें

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बाप मर गया और अगला अधिकारियों के साथ बैठकर मीटिंग कर रहा है कि अपने प्रदेश में कोरोना संकट से कैसे निपटा जाये।

और तो और, जालिम अंतिम दर्शन करने भी नहीं जा रहा. बोल रहा मेरा कर्तव्य मुझे कह रहा है कि तुम्हे प्रदेश की जनता के बीच रहना चाहिये।

ऊपर से, घर वालों को ज्ञान दे दिया कि भीड़ भाड़ करने की बजाय शांति से क्रिया कर्म निपटा दो।

क्या उस आदमी को उस बाप के वो कंधे नहीं याद आ रहे होंगे जिन पर चढ़ कर उसने दुनियां देखी होगी?

या फिर वो उंगलियां जिन्हें पकड़ कर जीवन का प्रथम डग भरा होगा ?

वो बाहें, जिनको तकिया बनाकर सो जाता था ?

या फिर वो आंखे जो अंतिम क्षण इंतजार कर रही थीं कि एक बार पुत्र को देख लूँ ?

लेकिन नहीं, अगले को इन सबकी याद नहीं आई।उसे ख्याल आया कि वह भारत के एक पिछड़े सूबे का मुखिया है और उसकी जरूरत 15-20 करोड़ लोगों को है।

और फिर उसने वही किया जो कभी लौह पुरुष कहे जाने वाले सरदार पटेल ने किया था।

ये ढोंगी बाबा, घंटा घड़ियाल वाली सरकार और संघी मानसिकता के लोग ऐसे ही होते हैं।

इस देश में बहुत सारे राजनेता हैं, योगी आदित्यनाथ को सीखना चाहिये धरतीपुत्र मुलायम सिंह जी, दलितों पिछड़ों के मसीहा लालूजी से या फिर गांधी नेहरू परिवार से।

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